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आर्य सभ्यता के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य है उसके द्वारा इस संसार में शारीरिक मानसिक आर्थिक और नैतिक अभ्युदय और परलोक में परम निःश्रेयस अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति । हमारे ऋषि मुनियों की दृष्ट में विद्या वही है जो हमें अज्ञान के बंधन से विमुक्त कर दे - सा विद्याया विमुक्तये ।1 आज बीसवीं शताब्दी में तो हमारी संस्कृति की सुदृढ नौका हमारे ही हाथों नष्ट भ्रष्ट होकर डूबने जा रही है। ऐसा मतिभ्रम हुआ है कि विनाश के गहरे गर्त में गिरना ही आज का प्रतिपादन किया गया है। वेद प्रतिपादित चारों वर्णों हमारे उन्नयन का निदर्शन हो गया है। इसमें युग प्रभाव तो प्रधान कारण है ही परन्तु उसकी सिद्धि में एक बडा निमित्त है हमारी यह वर्तमान धर्महीन शिक्षा पद्धति। वर्तमान शिक्षण संस्थानों में अध्ययन करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों में न्यूनाधिक रूप से, क्रियारूप में अथवा वैचारिक रूप में निम्नलिखित दोष मिलेंगे, जो विद्यार्थी ब्रह्मचारी जीवन से सर्वथा प्रतिकूल है
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ’अध्यात्मविद्या विद्यानाम् कहकर इसी सिद्धांत का समर्थन किया है। इसी उद्देश्य से आर्यजाति के पवित्रहृदय और समदर्शी त्रिकालज्ञ ऋषियों ने चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) की सुंदर व्यवस्था की थी। ब्रह्मचर्य के कठोर नियमों का पालन करता हुआ ब्रह्मचारी विद्यार्थी जब संयम की व्यवहारिक शिक्षा के साथ ही साथ लौकिक और पारलौकिक कल्याणकारी विद्याओं को पढ़कर, सब प्रकार से शरीर, मन और वाणी से स्वस्थ एवं संयमी होकर गुरुकुल से निकलता था, तब वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर क्रमशः जीवन को और भी संयममय, सेवामय और त्यागमय बनाता हुआ अन्त में सर्वत्याग करके परमात्मा के स्वरूप में निमग्न हो जाता था। यही हमारी आर्यसंस्कृति का स्वरूप था।
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Cite Article:
"वर्तमान शिक्षण व्यवस्था में संस्कृत की भूमिका", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.8, Issue 4, page no.503 - 504, April-2023, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2304084.pdf
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000205188
ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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