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संस्कृति का आधार सामान्यतः मनुष्य के द्वारा सम्पादित आचार-विचार हैं ये आचार-विचार वेदादि शास्त्रों पर अवलम्बित होते हैं। अतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा में इसके अनुरूप किए जाने वाले कार्य संस्कृति के प्राणतत्व होते हैं। इन प्राणतत्वों के पोषण के लिए कुछ यम-नियमों का निर्धारण किया गया। वर्णाश्रम व्यवस्था ने इसमें बहुत ही सकारात्मक भूमिका का निर्वहन कियज्ञं विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है भारतीय संस्कृति। युग-युगीन परम्पराओं ने इसका विकास किया और इसे समृति ( प्रदान की प्रकृति ने भी भारत को एक पृथक राष्ट्र बनाया।1 यद्यपि इसको अनेक विभाजनों ने विभिन्न आकारों में विभाजित किया है, किन्तु पिफर भी इसकी विशेषता को कमतर नहीं आंका जा सकता।2 हजारों वर्ष पूर्व लिखित विष्णुपुराण ने भी इसकी सीमाओं का विभाजन और उनका वर्णन प्राकृतिक रूप से उपलब्ध प्रतीकों के आधार पर ही किया था।
यानि, जो समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है, उसमें भारत की सन्तान निवास करती है। यह पुत्रा एवं माता का जो भाव है उसने इसे विभिन्न जाति, वर्ण, भाषा होने के बाद भी एक सूत्रा में बाँध कर रखा और इस भाव को वेदों ने ‘‘माता भूमिः पुत्रोडहम् पृथिव्याः4, यानी यह जो भारत-भूमि है यह मेरी माता है और मैं उसका पुत्रा हूँ। इसी के वशीभूत भारत-भूमि पर जो संस्कृति विकसित हुई, वह संस्कृति भारतीय संस्कृति के नाम से जगद्विख्यात हुई। यहाँ पर यह भी विचार करना समीचीन प्रतीत होता है कि अन्ततः संस्कृति होती क्या है ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द के शब्दों में ‘सम्’ उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ धातु से भूषण अर्थ में सुट् काआगम करके क्तिन् प्रत्यय करने से ‘संस्कृति’ शब्द बनता है। इसका अर्थ यह होता है कि भूषणयुक्त सम्यक् कृति। इसलिए भूषणयुक्त सम्यक कृति या चेष्टा ही संस्कृति कही जा सकती है। इस प्रकार भूषणयुक्त सम्यक् कृतियों का सम्पूर्ण क्षेत्रा संस्कृति का क्षेत्रा है।5 इस प्रकार से हिमालय से समुद्रपर्यन्त जो भी क्रिया-कलाप सम्पादित किए गए वे संस्कृति का हिस्सा बनते गए। सबसे अच्छी बात यह रही कि संस्कृति में उन्हीं तत्वों को समाविष्ट किया गया जोकि सम्यक् थे, शेष तत्वों को विलग कर दिया गया और समान मूलतत्वों को समाविष्ट करके एक धारा बहती रही। भारतरत्न पुरुषोत्तम वामन काणे लिखते है कि, ‘‘)़. ऋग्वेद’’ के काल से अब तक चली आई अत्यन्त विलक्षण धारणा यह रही है कि मूलतत्त्व एक है, भले ही लोग उसे इन्द्र, मित्रा, वरुण, अग्नि आदि किसी भी नाम से क्यों न पूजित करें। महाभारत, पुराण, संस्कृत काव्य के काल एवं मध्य काल में जबकि विष्णु, शिव या शक्ति से सम्बन्धित बहुत से सम्प्रदाय थे, सभी हिन्दुओं ;भारतीय, इस शब्द पर मेरा स्वयं का जोर है, क्योंकि आधुनिक काल में यह शब्द सही अर्थों में सर्वसमावेशी है और पौराणिक महत्त्व को भी प्रदर्शित करता है।द्ध में यहाँ अन्तश्चेतना थी कि ईश्वर एक है, जिसके कई नाम है।6 यही भाव था जिसनेसम्पूर्ण भारतवर्ष में वैविध्य का पोषण किया, यह वैविध्य चाहेकिसी भी क्षेत्रा में हो, भारतीयों ने न केवल उसको स्वीकारा, बल्किउसको अपने जीवन का अभीष्ट भी बना लिया, परिणामस्वरूप उसने सम्पूर्ण सृष्टि में ही ईश्वर का दर्शन शुरू किया।7 यही विशेषता भारतीय संस्कृति की आत्मा है। जैसे-जैसे यह भाव विकसित होता गया वैसे-वैसे भारतीय संस्कृति का व्याप भी बढ़ता गया और उसी प्रकार से विस्तृत होता चला गया भारतीय संस्कृति का वांग्मय। परिणामस्वरूप मनुष्य के लौकिक- पारलौकिक सर्वाभ्युदय के अनुकूल आचार-विचार ही संस्कृति है।8 ऐसा इसलिए भी सम्भव हो सका, क्योंकि इसमें ‘सर्वभूतहिते रतः’ को अपना मूलमंत्रा मानकर विचार किया गया है। इस भाव ने संपूर्ण आर्यावर्त को एक सूत्रा में गूँथकर रखा और यही दृष्टि ‘राष्ट्रवाद’ के पोषण में सहायक सिद्ध हुई। पफलतः हिमालय से लेकर सिन्धु तक समस्त तत्वों में एकात्मभाव का उदय हुआ। इस एकात्मभाव ने संस्कृति आध्रित सभ्यता का विकास किया और राष्ट्रवाद को भी सुदृढ़ता प्रदान की।
संस्कृति का आधार:--
मनुष्य के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, कलाकौशल, भाषा, वेशभूषा, उपासना आदि समस्त क्रियाकलाप वर्णाश्रम अनुकूल हों तो यही भारतीय संस्कृति का आधार है। बाद में इसी के आधार पर समस्त आर्यावर्त को ध्यान में रखकर साहित्यसृजन किया गया है और भारतीय जनमानस में ये समस्त विचार गहरे तक पैठ गए। जैसे-जैसे भारतीय संस्कृति विकसित होती गई वैसे-वैसे सम्पूर्ण आर्यावर्त में विभिन्न स्थानों पर विद्यमान स्थलों को अपने दैनन्दिन जीवन के लिए उपयोगी मानकर उसे सम्मानित स्थान दिया जाने लगा।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन्, संधि कुरु।।9
भारत भू-भाग की सातों महानदियाँ जिनका सम्बन्ध सम्पूर्ण भारत से है, का स्मरण स्नान करते समय प्रत्येक भारतीय अपना परम कर्तव्य मानता है और ऐसा करके वह सम्पूर्ण भारत की समस्त नदियाँ, जो कि इन नदियों के माध्यम से समुद्र में समाहित हो जाती है, के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
महेन्द्रो मलयः सह्यः शक्तिमानृक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियत्राश्च सप्तैते कुलपर्वतः।।10
ये सभी पर्वत भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और पर्यावरण का भी संरक्षण करते हैं। साथ ही साथ वर्षा के जल को अपने में समाकर वर्षपर्यन्त नदियों में जल के स्राव से भारतीयों के जीवन में जल की उपलब्धता बनाए रखते हैं। इस प्रकार से भारतीय इनके साथ न केवल तादात्म्य स्थापित करते हैं, बल्कि इनके प्रति अपनी कृतज्ञता भी ज्ञापित करते हैं। यह कृतज्ञता उनमें राष्ट्रभाव का पोषण करती है। इसी प्रकार प्रातःकाल जब भारतीय शय्ाा का त्याग करता है तो इस भूमि से वह इस प्रकार अभ्यर्थना करता है कि-
‘समुद्रवसने देवि, पर्वतस्तन मण्डले,
विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।’11
यानि, हे भूमि माता! आप विष्णु की पत्नी हैं मैं दिनभर आपको अपने पैरों से स्पर्श करूँगा अतः आप इस कृत्य के लिए क्षमा करें। जिस समाज का भाव इसी भूमि के लिए इस प्रकार का रहा है वह निश्चय ही उसके सम्मान के दृष्टिकोण को विकसित करेगा और उसी अनुरूप व्यवहार भी करेगा। भारत में विचार के आधार पर सम्पूर्ण दर्शन विकसित हुआ।
राष्ट्र की उत्पत्ति और विकास:--
आधुनिक काल में राष्ट्र को राज्य का पर्याय मान लिया गया है। जबकि ऐसा नहीं है। राष्ट्र के लिए राज्य के आवश्यक चारों अंगों में से मात्रा तीन हीे आवश्यक होते हैं और वे हैं- जनसंख्या, निश्चित भूभाग और सरकार, किन्तु राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है सम्प्रभुता, वह राष्ट्र के लिए आवश्यक नहीं है। इसलिए भारत वैदिक काल से अनेक राज्यों में विभक्त होकर भी राष्ट्र था, क्योंकि राष्ट्र का आधार सरकार या सम्प्रभुता नहीं होती हैं, अपितु संस्कृति और भूभाग के प्रति आत्मीय भाव होता है, जैसा कि मैंने पूर्व में भी लिखा है कि भारत और इसके निवासियों में जो सम्बन्ध है वह माता और पुत्रा का है। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त कुछ इस प्रकार से इस विषय को प्रस्थापित करता है।
यस्यां समुद्र उत् सिन्धुरापो, यस्मान्नं कृष्टयः सम्बभूवुः।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत, सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु।।12
यानि,
जिस मातृभूमि के अंग उदधि लहराता,
सरिता करती कलगान सलिल छवि पाता।
खेती होती है, अभिमत अन्न उपजाता,
जिस पर जड़ जंगम विश्व सुहाता सजता।
यह प्राणि जगत भी जहां तृप्त है होता,
चलता पिफरता है जहां बैठता सोता,
वह भूमि कृपा कर हमको वही,ं बसाये,
हम जहां प्रथम नित मधुर पेय इस पाएँ।
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Cite Article:
"बंकिमचन्द्र चटर्जी की राष्ट्रवादी अवधारणा आधुनिक भारत के विशेष सन्दर्भ में", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.9, Issue 3, page no.193 - 198, March-2024, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403029.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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