IJRTI
International Journal for Research Trends and Innovation
International Peer Reviewed & Refereed Journals, Open Access Journal
ISSN Approved Journal No: 2456-3315 | Impact factor: 8.14 | ESTD Year: 2016
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Paper Title: दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र
Authors Name: डॉ. पूजा जोरासिया
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Author Reg. ID:
IJRTI_189318
Published Paper Id: IJRTI2403030
Published In: Volume 9 Issue 3, March-2024
DOI:
Abstract: भारतीय साहित्य की सभी भाषाओं में लगभग एक ही समय पर दलित साहित्य का सूत्रपात हुआ। अस्मितामूलक विमर्शों के दौर में, दलित साहित्य अस्मिता और अस्तित्व दोनों के संकट को जीवित अनुभव के रूप में प्रस्तुत करता है। जाति के प्रश्न पर सदियों से चली आती असमानताएँ भारतीय जन समाज में इस तरह विन्यस्त हैं कि एक बड़ा वर्ग हाशियाकृत उपस्थिति में जीवन जीने को विवश है। जातिवाद का सबसे भीषण संकट स्पर्श-जनित है। अस्पृश्यता एक ऐसा अभिशाप है जिससे मुक्ति के लिए सामाजिक संरचनाओं में व्यापक परिवर्तन अपेक्षित है। संवैधानिक व्यवस्था हर नागरिक के लिए बराबरी के अधिकार को सुनिश्चित करती है लेकिन सामाजिक संरचनाएँ भेदभाव को ख़त्म नहीं होने देतीं। सशक्तिकरण की अनेक तदबीरों में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। दलित साहित्य इसी आकांक्षा का मूर्तिमान रूप है। आज़ादी के बाद(भी) और आज़ादी के बावजूद दलित-जीवन के अंधकारमय पृष्ठों से यातना और संघर्ष की इबारत मिटाई नहीं जा सकी। प्रतिदिन ऐसी घटनाएँ घट रही हैं जो बताती हैं कि दलित शोषण थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ आज भी बदस्तूर जारी है। यह अमानवीय व्यवहार तथा जातिगत शोषण ही दलित साहित्य का प्रस्थान-बिंदु है। दलित साहित्य जिस नए सौन्दर्यशास्त्र की पैरवी करता है उसमें साहित्य का संबंध संघर्ष और जागृति से है। कविता या साहित्य नुमाइश की वस्तु नहीं, न ही काव्यात्मक चमत्कार उत्पन्न करना उसका लक्ष्य है। इस साहित्य का लक्ष्य न्याय की पुकार है। अम्बेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित यह साहित्य शोषण से मुक्ति का शंखनाद है। यातना की स्मृति जिस पृष्ठभूमि का निर्माण करती है, सामाजिक विमर्श की शुरुआत वहीं से होती है। समाज के स्थापित ढाँचे का अस्वीकार, उसे प्रश्नांकित कर उससे टकराने की कोशिश, दलित साहित्य का नया सौंदर्यशास्त्र रच रही है। रचनाओं, भिन्न शब्दों और पंक्तियों में एक विचार जो बार-बार सबको उद्वेलित करता है उसे सुशीला टाकभौरे की काव्य-पंक्ति में पढ़ा जा सकता है– ‘दुख हमें, सुख उन्हें /कैसी यह विडंबना’। ऐसी पंक्तियों में विषम समाज की प्रत्यालोचना रूप धरने लगती है। दलित रचनाकारों ने महसूस किया कि यह कुछ लोगों-वर्गों की धोखाधड़ी है जो बहुजन समाज को लगातार शहरों की परिधि पर धकेल कर, उतरन व जूठन पर जीने को विवश करती है। उनकी कवितायें-कहानियाँ ऐसे ब्यौरों से भरी पड़ी हैं जिनमें वर्गों के बीच असमानता की निरंतर बड़ी होती खाई का अहसास है। ऐसे विवरणों में उनका स्वर चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कहीं यातना के स्वर हैं तो कहीं चेतना के, कहीं शोषकों को धिक्कार है तो कहीं अन्याय के विरुद्ध अत्याचारियों से बदला लेने की हुंकार है। दलितों के यातनामय जीवन के अनेक कारुणिक प्रसंग हैं। शोषण के ये सन्दर्भ अपमान की पीड़ा को जीवित रखते हैं। जातीय उत्पीड़न की अनगिनत परतें तथा स्त्री जीवन का दोहरा-तिहरा अभिशाप–इस साहित्य के शब्द-शब्द में प्रस्फुटित होता है। अधिकांश रचनाओं का विषय-बोध बार-बार इसी घेरे में घूमता है। शायद अनेकश: कहने पर भी पीड़ा पूरी तरह चुकती नहीं। मुक्ति-कामना के लिए अपने अस्तित्व व स्वाभिमान के प्रति इस तरह की सचेतता ही जागरण का उत्स है। इस साहित्य की सार्थकता इसी बात में है कि सोये हृदयों को आंदोलित किया जा सके। ऐसे बहुत से विवरणों की बहुतायत के कारण दलित साहित्य की साहित्यिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाया गया। अस्मिता के आधार पर इस साहित्य की अलग सत्ता को स्वीकार करने की अपेक्षा, इसे साहित्य में आरक्षण की माँग कह कर खारिज करने की कोशिश की गई। दरअसल यह सारी जद्दोजेहद इसलिए थी कि यह साहित्य आलोचना के स्थापित ढाँचे में परिवर्तन की माँग कर रहा था और अपने पृथक अस्तित्व को लगातार जता रहा था। शरण कुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कँवल भारती– अनेक विचारकों ने दलित साहित्य की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए साहित्यिक अभिरुचि के परिवर्तन को रेखांकित किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने यह आरोप लगाया कि ‘हिंदी साहित्य में ढूँढ़ने पर भी हमें अपना चेहरा दिखाई नहीं देता’। शरण कुमार लिंबाले का विचार था ‘अछूत का अनुभव, जाति-व्यवस्था का कलंक अलग कर दिया जाए तो सर्वहारा का जीवन एक जैसा होता है। प्रत्यक्ष जाति-व्यवस्था होने के बावजूद उसे नकार कर सभी का जीवन एक समान है कहना वास्तविकता को नकारना तथा यथार्थ पर लीपा-पोती करना है। अछूत के अनुभव की ओर से आँखें नहीं मोड़ी जा सकतीं क्योंकि यह त्रासद अनुभव हज़ारों वर्षों से हज़ार मनुष्यों का है। दलित साहित्य का जन्म अस्पृश्यता की कोख से हुआ है और यही इसकी विशेषता है।‘ इस अनुभव के आधार पर ही दलित चिंतकों ने आलोचना में कल्पना की विधायिनी शक्ति और आनंद की प्राप्ति जैसे सिद्धांतों को सिरे से नकार दिया उनके अनुसार प्रगतिशील आलोचना भी उनके जीवन को काल्पनिक ढंग से प्रस्तुत करती है। सहानुभूति के लिए रहस्य रोमांच का ऐसा वायवीय लोक रचती है जो यथार्थ से कोसों दूर है। जातिगत असमानता पर अवस्थित यथार्थ का सही चित्रण दलित साहित्य की आलोचना का सबसे बड़ा प्रतिमान है। यही तत्व उनके कथ्य और भाषा दोनों को निर्देशित करता है साहित्यिक आलोचना की कसौटियों का निर्माण इस आधार पर होना चाहिए कि बोलने वाले की ‘सामाजिक स्थिति’ एवं ‘भौतिक उपस्थिति’ उसके लेखन को कैसे नियंत्रित करती है अर्थात रचनाकार समाज के किस वर्ग की नुमाइंदगी कर रहा है। समाज की वृहत्तर संरचना में जो ताक़तें उसका हाशियाकरण करती है वह उन्हें कैसे संबोधित करता है। उसका स्थान और समय, उसकी अभिव्यक्ति के अर्थ-आशय को कई स्तरों पर प्रभावित करता है। यह अकारण नहीं है कि दलित साहित्य की आधारभूत रचनाएँ जिनसे इस साहित्य को अलग पहचान मिली आत्मकथात्मक हैं। शरण कुमार लिंबाले की ‘अकरमाशी’, दया पवार की ‘अछूत’, मोहनदास नैमिशराय की ‘अपने-अपने पिंजरे’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’, श्योराज सिंह बेचैन की ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’, कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’, बेबी कांबले की ‘जीवन हमारा’ और सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ ऐसी आत्म कथाएँ हैं जिन्होंने दलित साहित्य को व्यापकता प्रदान की। इनके माध्यम से इन रचनाकारों के जीवन की ओर तो हमारा ध्यान गया ही अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था भी बेनक़ाब होती है। यातना के चित्र, संघर्ष का साहस देते हैं। ये रचनाएँ एक तरह से सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से एक सक्रिय हस्तक्षेप हैं जिन्होंने सामाजिक एवं साहित्यिक कुलीनतावाद को एक साथ चुनौती दी।
Keywords: .
Cite Article: " दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.9, Issue 3, page no.199 - 207, March-2024, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403030.pdf
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ISSN: 2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 8.14 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator
Publication Details: Published Paper ID: IJRTI2403030
Registration ID:189318
Published In: Volume 9 Issue 3, March-2024
DOI (Digital Object Identifier):
Page No: 199 - 207
Country: kota, Rajasthan, india
Research Area: Arts
Publisher : IJ Publication
Published Paper URL : https://www.ijrti.org/viewpaperforall?paper=IJRTI2403030
Published Paper PDF: https://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403030
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