IJRTI
International Journal for Research Trends and Innovation
International Peer Reviewed & Refereed Journals, Open Access Journal
ISSN Approved Journal No: 2456-3315 | Impact factor: 8.14 | ESTD Year: 2016
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Paper Title: प्रेमचंद की साहित्य दृष्टि एवं मानव मूल्य
Authors Name: डॉ. ओमप्रकाश राठौड़
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Author Reg. ID:
IJRTI_190370
Published Paper Id: IJRTI2403104
Published In: Volume 9 Issue 3, March-2024
DOI:
Abstract: किसी साहित्यकार की साहित्य दृष्टि उसके जीवन-दर्शन से गहराई से प्रभावित होती है। जीवन-दर्शन वह दृष्टिकोण है, जिसे साहित्यकार अपने पारिवारिक संस्कारों, शिक्षा, संस्कृति, और परिवेश के आधार पर विकसित करता है। इसके साथ ही, उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ, अनुभव, और चिंतन भी इस दृष्टिकोण को आकार देते हैं। जैसे-जैसे वह अपने आसपास की दुनिया को समझता है और समाज के विभिन्न पहलुओं से परिचित होता है, उसका जीवन-दर्शन विकसित होता है। यह परिवर्तन उसके लेखन में भी दृष्टिगोचर होता है, और साहित्य दृष्टि के विकास में यह एक महत्वपूर्ण कारक होता है। साहित्य दृष्टि के विकास में समय और परिवेश का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। जब एक साहित्यकार अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक स्थितियों को समझता है, तो वह अपने विचारों और संवेदनाओं को उन परिस्थितियों के अनुरूप ढालता है। इसी प्रकार, प्रेमचंद जैसे लेखक ने अपने समय की समस्याओं को अपने लेखन में शामिल किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में उन मुद्दों पर प्रकाश डाला, जो भारतीय समाज को प्रभावित कर रहे थे, जैसे गरीबी, जातिवाद, और साम्राज्यवाद। प्रेमचंद की साहित्य दृष्टि मानव मूल्यों पर आधारित है। उन्होंने भारतीय जनसंस्कृति की गंगा को अपने लेखन के माध्यम से जीवंत किया। उनके उपन्यासों और कहानियों में न केवल सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास किया गया, बल्कि भारतीय समाज के हृदय में बसने वाले मानव मूल्यों का भी दर्शन कराया गया। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य का उद्देश्य मानवता की सेवा करना होना चाहिए। वे लिखते हैं, “मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें गड्ढे तो कहीं-कहीं हैं, पर टीलो, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है।” यह वाक्य उनकी सोच के गहरे अर्थ को स्पष्ट करता है। उन्होंने अपने जीवन को एक साधारण लेकिन अर्थपूर्ण दृष्टिकोण से देखा, जो उनके लेखन में भी परिलक्षित होता है। प्रेमचंद ने हिंदुस्तान की नई राष्ट्रीय और जनवादी चेतना को अपने लेखन का आधार बनाया। उन्होंने देखा कि जब वे लिखना शुरू कर रहे थे, तब पहली विश्व युद्ध का प्रभाव और उसके बाद की चुनौतियाँ समाज पर मंडरा रही थीं। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय जनता के अटल विश्वास को प्रकट किया। उन्होंने लिखा, “यह अंत नहीं है, और आगे बढ़ो और आगे बढ़ो” यह उनका आवाहन भारतीय जनता को साम्राज्यवादी और सामवादी शक्तियों के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा देने का था। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लाने की प्रेरक भी थीं। प्रेमचंद का उद्देश्य था कि वे अपने लेखन के माध्यम से जनमानस को जागरूक करें और उन्हें सामाजिक बदलाव की दिशा में प्रेरित करें। उनके पात्रों में जो संघर्ष और पीड़ा है, वह उनके समाज की वास्तविकता को दर्शाती है। उनके उपन्यासों में पात्रों की दुर्दशा और संघर्ष की कहानी है, जो समाज के वास्तविक परिदृश्य को उजागर करती है। प्रेमचंद की दृष्टि ने न केवल उनके समकालीनों को प्रभावित किया, बल्कि आज भी उनकी रचनाएँ समाज में व्याप्त समस्याओं के समाधान की ओर इंगित करती हैं। उनके साहित्य में जो संवेदनाएँ और विचार हैं, वे आज भी प्रासंगिक हैं, और यह दर्शाता है कि साहित्य एक निरंतर विकसित होती प्रक्रिया है, जो समाज के बदलते परिदृश्य के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करती है। इस प्रकार, प्रेमचंद का जीवन-दर्शन और साहित्य दृष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने अपने समय की समस्याओं को अपने लेखन में समाहित किया और अपनी लेखनी के माध्यम से जनहित की बात की। उनका साहित्य न केवल पढ़ने के लिए है, बल्कि यह एक प्रेरणा स्रोत भी है, जो समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को रेखांकित करता है। प्रेमचंद की सोच, संवेदनाएँ, और उनके पात्रों का संघर्ष हमें यह सिखाते हैं कि हमें समाज की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। प्रथम असयोग आन्दोलन के दौरान प्रेमचंद ने कलम की तलवार से साम्राज्यवाद से लोहा लिया। प्रेमाश्रम जैसा श्रेष्ठ राजनैतिक उपन्यास लिखा, जिसे पढ़ पढ़कर नौजवान लोग स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े । विदेषी सत्ता के प्रति जनता का विद्रोही स्वर सन् 1857 के देष व्यापी आन्दोलन के फूट पड़ा था । ’इंडियन म्यूटिनी’ के लेखक “जान के शब्दों में “गंगा पार के इलाके में ही नहीं, दोआब के जिलों में भी -ग्रामीण जनता उठ खड़ी हुई थी और जल्दी ही ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं बचा, जो अंग्रेजो के विरूद्ध उठ खड़ा हुआ हो। “ बंगभंग की घटना 1916 में महात्मा गाँधी का पदार्पण 1919 में 1905 मे जलियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड 1931 में असहयोग आन्दोलन 26 जनवरी 1930 का लाहौर अधिवेषन इत्यादि ऐसी राजनीतिक घटनायें थी जिन्होंने प्रेमचंद को भी आन्दोलित किया था। प्रेमचंद के उपन्यासों मे जीवन का बड़ा व्यापक और विविधतापूर्ण चित्रण है- राष्ट्रीय आन्दोलन कृषक समस्या, शोषण मानवतावाद भारतीय संस्कृति, विधवा-विवाह, अनमेल विवाह, दहेज-प्रथा, किसान महाजन, समाज में व्याप्त छुआछूत एवं साम्प्रदायिता की समस्या और राजनीतिक समस्या इत्यादि। उनके उपन्यासों के समान ही उनकी कहानियाँ भी बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखी है, जो अनेक कहानी-संग्रहों के रूप में संकलित हुई है। उनकी कहानियों का मुख्य संग्रह मानसरोवर (भाग - 8) है। प्रेमचंद ने कुछ जीवनियाँ भी लिखीं - रामचर्चा दुर्गादास तथा कलम तलवार और त्याग (दो भाग) कुछ विचार और साहित्य का उद्देष्य में उनके लेख और टिप्पणियाँ हैं । प्रेमचंद का प्रकाषित हो चुका साहित्य कम नहीं है, और उर्दू में उनकी बीस खण्डों में प्रकाशन हो चुका है। प्रेमचंद की मान्यता है कि “ हम (साहित्यकार ) तो समाज का झंडा लेकर चलने वाले सिपाही है और सारी जिन्दगी के साथ ऊंची निगाह हमारे जीवन का लक्ष्य है।“ उनकें अनुसार “लेखक जो कुछ लिखता है अपने कुरेदन से लिखता है अर्थात जब लेखक संवेदनात्मक पीड़ा का अनुभव करता है, सत्य का साक्षात्कार करता है तभी लिखता है, और जब तक यह पीड़ा लेखक में न हो 1. यह सत्साहित्य की रचना नही कर सकता । प्रेमचंद ने साहित्यकार को दलितों और विवष जनों का वकील माना है।“ वह साहित्यकार, मानवता, दिव्यता और भद्रता का बाना बाँधे होता है, जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है- चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उसकी हिमायत और वकालत करना उसका फर्ज है। प्रेमचंद युग में साहित्य आडम्बर से मुक्त हो गया और अनुभूति की सच्चाई उसमें प्रस्फुटित होने लगी । प्रेमचंद साहित्य को जन- सामान्य की सेवा के साथ जोड़ने के आकांक्षी है। वे व्यसन - जन्य साहित्य को आत्महीन एवं निर्जीव मानते है । उनके अनुसार संकुचित भावनाओं के लिए साहित्य में स्थान नहीं है। उनकी मान्यता है कि साहित्य का कार्य ही मानव हृदय को परिष्कृत एवं विष्व मैत्री की भावना को स्थापित करना ळें हिन्दी साहित्य के इतिहास और परम्परा को जानने वाले लोग सहज रूप से यह समझाते है कि प्रेमचंद बार-बार प्रेम का जीवन का मुख्य विषय न समझने पर क्यों जोर देते थें। वास्तव में वह बुनियादी तौर पर प्रेम का विरोध नहीं करते थे। उनका मतलब प्रेम कहानी के जरिए पाठकों को प्रेरणा और षिक्षा देने से ही था ।
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Cite Article: "प्रेमचंद की साहित्य दृष्टि एवं मानव मूल्य", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.9, Issue 3, page no.759 - 763, March-2024, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403104.pdf
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ISSN: 2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 8.14 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator
Publication Details: Published Paper ID: IJRTI2403104
Registration ID:190370
Published In: Volume 9 Issue 3, March-2024
DOI (Digital Object Identifier):
Page No: 759 - 763
Country: gangapur city, rajasthan, india
Research Area: Arts
Publisher : IJ Publication
Published Paper URL : https://www.ijrti.org/viewpaperforall?paper=IJRTI2403104
Published Paper PDF: https://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403104
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