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प्राचीन भारत में भोजन मूल रूप से प्राचीन अतीत से भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक विकास को दर्शाता है। प्राचीन भारत खाद्य पदार्थों की खेती उपजाऊ नदी घाटियों में की जाती थी। जटिल धार्मिक अनुष्ठानों के केन्द्र में आने के साथ पशु बलि चरम पर थी। प्राचीनकाल में दूध और दुग्ध उत्पादों का प्रयोग, चावल, दही, गेहूं, दाल, सब्जियां इत्यादि का प्रमुख खाद्य पदार्थ थे। लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे साथ में पेय का भी प्रयोग करते थे जिसे विभिन्न नामों यथा - सुरा, सोम, शराब, ताड़ी, मदिरा, इत्यादि से जाना जाता है।
वैदिक काल में आर्यो द्वारा शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन किया जाता था। ऋग्वेद में एक स्थान पर दूध में पकी हुई खीर (क्षीर पकौदन) का उल्लेख हुआ है तथा दही में बनने वाले पनीर का उल्लेख मिलता है। घी में पके हुए मालपूवे (अपूपं घृतवंतम्) का भी वर्णन मिलता है। सोम व सुरा आर्यों के मुख्य पेय थे। सोम अपनी मादकता के लिए प्रख्यात था, जिसे मूजवंत पर्वत पर प्राप्त किया जाता था। इसका पान करने से शरीर में उत्साह भर जाता था तथा मोहकता छा जाती है। ऋग्वेद के नवें मण्डल में सोम की स्तुति की गई है। एक स्थान पर कण्व ऋषि दावा करते हैं कि सोमरस पीने के बाद उन्होंने अमरत्व प्राप्त कर लिया है।1 सोम के बारे में कहा गया है -
’’हे सोम! तेरे समान दिव्य कोई चीज़ नहीं है। जब तू गिराया जाता है तो तू सब देवताओं को अमरत्व देने के लिए निमन्त्रित करता है।
’’हे सोम! जिस लोक में अक्षय ज्योति होती है और जहां स्वर्ग स्थित है, उसी उमर और मरण विहीन लोक में तु मुझे ले चल! तु इन्द्र के लिए बह।’’2
सैंधव लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे, गेहूँ, जौ, चावल, तिल, दाल आदि उनके प्रमुख खाद्यान्न थे। शाक-सब्जियां, दूध तथा विभिन्न प्रकार के फलों जैसे खरबूजा, तरबूज, नारियल, नींबू, अनार आदि शाकाहारी भोजन थे, भेड़, बकरी, सुअर, मुर्गी, बतख, घड़ियाल आदि के मांस तथा मछलियां खाई जाती थी।3
महाभारत काल में खाद्य पदार्थों व पेय का विशेष समन्वय मिलता है, युधिष्ठिर के अवश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर शराब के समुद्र, मक्खन की झील और चावल के पहाड़ उपस्थित थे।4 इसी प्रकार जब राम को अयोध्या से 14 वर्षों का वनवास मिला तो आशीर्वाद में हाथ जोड़कर सीता गंगा माता को कहती है, देवी प्रसन्न हो, जब हम वापस आएंगे तो आपको चावल के साथ पकाया मांस के साथ 1000 बर्तन मादक पेय अर्पित करेंगे।5
मौर्य काल में भोजन में विविध प्रकार के व्यंजन,दूध व मांस का समावेश होता था। यद्यपि जैन और बौद्ध धर्मों की अहिंसावादिता में मांस भक्षण का र्को स्थान नहीं था। कौटिल्य के कथानुसार पशुओं के बलिदानगृह बनाये जाते थे। अंगूर का रस, मधु, शरबत (ये आम, जम्बू तथा विविध प्रकार के फलों से तैयार किये जाते थे) और फलों के रस से पय तैयार किया जाता था। सुरा का प्रयोग प्रचलित था किंतु इसके क्रय-विक्रय पर राज्य का (सुराध्यक्ष) नियंत्रण रहता था। मेगास्थनीज ने लिखा है कि विशेष अवसरों को छोड़कर साधारणतया भारतीय मद्य से दूर रहते है, परंतु यह कथन केवल ब्राह्मणों के लिए ही मान्य हो सकता है, अन्य वर्गों में सुरा सेवन का प्रचलन था। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में विविध प्रकार की मदिरा का उल्लेख किया है।6
कालिदास के ग्रंथो में आमियाहार का उल्लेख मिलता है। ’शकुंतला’ नाटक में माढव्य भुने हुए सुअर का मांस खाता है, यद्यपि वह जाति का ब्राह्मण है। लोग मांस-मछली का भक्षण करते थे। बृहस्पति (स्मृति-ग्रंथ) का कथन है कि केवल प्रोपितभर्तृकाओं (जिन स्त्रियों के पति विदेश चले गये हैं) को मांस-मदिरा के प्रयोग से अलग रहना चाहिए। अतः स्त्रियाँ भी सुरा-मांस का प्रयोग करती थी। ’’मालविकाग्निमित्र’’, ’रघुवंश’, ’कुमार संभव’ कालिदास द्वारा रचित तीनों ग्रंथों में स्त्रियों के मद्यपान का उल्लेख मिलता है। ’मालविकाग्निमित्र’ की रानी इरावती तो इतनी शराब पीती है कि उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं।7 गुप्त काल में भोजन में गूहूं, जौ, चावल, दाल, शक्कर, गुड़, दूध, घी, तेल, मिठाई आदि का प्रमुख रूप से प्रयोग करते थे। चावल कई प्रकार के होते थे जैसे शःलि, नीवार, कलम और श्यामक। दूध शक्कर और आटे से विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्न बनाये जाते थे यथा - पयस, चारू, मोदक, शिखरिथी इत्यादि। काली मिर्च, इलायची लोंग, नमक आदि मसालों का भी उपयोग करते थे। समाज में शाकाहार और मांसाहार दोनों का प्रचलन था। सभी वर्ग के लोग मद्यपान करते थे। मद्यपान में चषक नामक पात्र में किया जाता था। विविध प्रकार की मदिरा का प्रचलन था जैसे - मद्य, मदिरा, आसव, वारूणी, कादम्बरी, शीधु, मधूक, नादिकेलासव, पाटल इत्यादि। रघुवंश में उल्लेख मिलता है कि अज और इन्दुमति मदिरा की घूंटे एक दूसरे से अदल बदल कर पीते थे।8
फाह्यिान अपने विवरण में अधिकांश भारतीयों को शकाहारी बताते हैं। उनके अनुसार मध्य-प्रदेश में पशुवध, मद्यपान, प्याज-लहसुन का प्रयोग अज्ञात था। किन्तु ह्वेनसांग के अनुसार समाज में शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों ही प्रकार के लोग थे। मांस साधरण तथा ताजे ही खाये जाते थे और अनेक प्रकार के पशुओं का जैसे गाय, हाथी, घोड़े, गधे, सुअर, कुत्ते, लोमड़ी, भेडिया, बंदर तथा अन्य बालों वाले पशुओं का मांस खाया जाता था। शाकाहारी भेाजन में घृत, दुग्ध, दही, वक्र, अन्न, चावल, शाक, अदरक तथा सरसों का प्रयोग होता था। पेय पदार्थों में मदिरा का प्रयोग करते थे। साधारणतः ह्वेनसांग ने अंगूर और गन्ने के रस से बनी हल्की मदिरा का प्रयोग क्षत्रियों में, ब्राह्मण और भिक्षु-वर्ग अंगूर अथवा इक्षुरस का प्रयोग करते थे। वैश्य वर्ग के लोग तेज मदिरा का प्रयोग करते थे।9
संगम युगीन समाज भोज्य पदार्थों में दूध में तर आधम् (हलवा), कछुवे का मांस एवं विशेष प्रकार की मछलिया स्वादिष्ट व्यंजन होते थे। ब्राह्मणों के भी प्रायः मांसभक्षण, ताड़ी-सेवन तथा सुरापान के उल्लेख मिलते हैं। शासक वर्ग विषय-वासना, सुरा-पान, विदेशी मदिरा इत्यादि का प्रयोग मंनोरंजन हेतु करते थे।10 सैनिकों के लिए मांसाहार की व्यवस्था राज्य द्वारा करायी जाती थी। पेय पदार्थों में विशेष रूप से हरे बोतलों में रखी गयी विदेशी मदिरा, मुन्नीर - जो कच्चे नारियल, ताड़ के जूस तथा गन्ने के जूस को मिलाकर बनायी जाती थी तथा बांस के पीपे में भरकर जमीन में गाड़कर पकाई गई ताड़ी का उपयोग किया जाता था।11 शुद्रक के ’’मृच्छकटिकम्’’ में बर्फ वाली मदिरा पीने का उल्लेख मिलता है, कि वेश्यानुरागी बर्फ में मिली मदिरा वेश्यालयों को भेंट करते थे।12
पूर्व मध्यकाल में आमतौर पर संयासियों के लिए मांसहार और मदिरापान वर्जित था। लजेकिन कनफटे योगी मांस खाते थे, मदिरापान करते थे और गांजा-भांग का सेवन करते थे। अघोरी तो मानव शव का भी भक्षण करते थे।13 बंगाल में शक्ति मत का प्राबल्य और मंत्रायन के प्रचारक े फलस्वरूप मांस-भक्षण एवं मदिरा पान का काफी जोर दिया जाता था।14 आठवीं से बारहवीं सदी के मध्य भोजन में अनेक प्रकार के अन्न, फल, चावल, सब्जी, मांस, सुरा का सेवन करते थे। कहीं-कहीं ब्राह्मणों द्वारा भी मांसाहार का उल्लेख मिलता है।
पल्लवकालीन समाज सादगी पसंद था, प्रायः लोगों का भोजन सादा व सात्विक होता था। तत्कालीन समाज में सुरापान विशेष प्रचलित था। शासक वर्ग एवं उच्च वर्ग के लोग विदेशों से आयातित मदिरा के शैकिन होते थे।15 आठवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य मोर, घोड़ा, जंगली गधा, जंगली मुर्गा और जंगली सुअर को वैध खाद्य पदार्थ माना जाता था। विवाहों और भोजों समेत अनुष्ठानों के अवसरों पर शराब पी जाती थी। राजा के लश्कर में स्त्रियाँ जमकर शराब पीती थी।16 कश्मीर में बारहवीं सदी में लिखी ’’राजतरंगिणी’’ में उल्लेख मिलता है कि दरबारी जहां तला हुआ मांस खाते थे तथा फूलों से सुसंगधित ठंडी शराब पीते थे, वहीं साधारण जनता को चावल और उत्पल-शाक (खट्टे स्वाद वाली एक जंगली वनस्पति) पर संतोष करना पड़ता था।17
इस प्रकार प्राचीनकालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में खाद्य तथा पेय पदार्थों को समय-समय पर बहुत से परिवर्तनों के साथ अपनाया है जो भारतीय संस्कृति के भीतर आत्मसात करने की संस्कृति को दर्शाता है।
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Cite Article:
"प्राचीन काल में खाद्य तथा पेय पदार्थों का प्रयोग और उनके प्रकारों का विश्लेषण", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.9, Issue 3, page no.775 - 777, March-2024, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2403106.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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