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विश्व की वसुंधरा पर एकता का नाम हो , द्वेष मिट जन जन के मन से मानवता पहचान हो,
राष्ट्र की सीमा हो ,या हो पार सिंधु की धरा , इंसानियत से बड़ा ना कोई पैगाम हो।।
दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद भारतीय सांस्कृतिक चेतना और मूल्यों का एक सजीव दर्शन है, जो मानव जीवन के भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक चारों पहलुओं की समन्वित अभिव्यक्ति पर बल देता है। इस सिद्धांत में व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है। उपाध्याय जी के विचारों में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा एक केंद्रीय तत्व के रूप में विद्यमान है, जो संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। हम सभी जानते हैं 21वीं सदी का भारत तेज गति से बदल रहा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैश्वीकरण ने जहां आज इस विश्व को नए युग की ओर उन्मुख किया है तो इसके साथ ही असमानता ,हिंसा,नैतिक पतन और पर्यावरणीय क्षरण जैसी समस्याओं ने मानवता को गहरे संकट में डाल दिया है । ऐसे में इन वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो न केवल भौतिक उन्नति बल्कि मानवीय मूल्यों और आत्मिक संतुलन पर भी आधारित हो।
यह शोध पत्र उपाध्याय जी के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता का परीक्षण करता है और यह स्थापित करता है कि आज के संकटों से निपटने के लिए उपाध्याय जी के सिद्धांत अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं।
वसुधैव कुटुंबकम’ का अर्थ है सम्पूर्ण पृथ्वी को अपना कुटुंब (परिवार) मानना, जिसमें पारस्परिक प्रेम, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना निहित है। एकात्म मानववाद इस आदर्श को व्यवहारिक धरातल पर लागू करने का प्रयास करता है, जहाँ राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक समरसता का समुचित संतुलन स्थापित होता है। दीनदयाल उपाध्याय ने यह माना कि समाज को केवल भौतिक प्रगति के आधार पर नहीं, बल्कि अध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।यह शोधपत्र एकात्म मानववाद के दर्शन में निहित वसुधैव कुटुंबकम के विचार की गहन विवेचना करता है। साथ ही, यह विश्लेषण करता है कि किस प्रकार उपाध्याय जी के सिद्धांत आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी मानवता के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। समकालीन समय में, जब समाज विविध संकटों से जूझ रहा है, तब एकात्म मानववाद और वसुधैव कुटुंबकम की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है।
Keywords:
एकात्म मानववाद, वसुधैव कुटुंबकम, दीनदयाल उपाध्याय, भारतीय दर्शन, वैश्विक एकता
Cite Article:
"A Study of the Concept of Vasudhaiva Kutumbakam in Deendayal Upadhyay's Integral Humanism
", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.10, Issue 7, page no.b58-b67, July-2025, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2507109.pdf
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000468
ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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